Raj Bhasha

 

के.वि. रेलवे स्टाफ को समर्पित कविता

 

इस के.वि. के प्रियमित्रों तुमको

ये भाव सुमन समर्पित तुमको

1.      सफल प्रशासक के राज में

रुकता न किसी का काम है,

इन शांतिरुप कर्मयोगी, श्री पंकज जी को,

मेरा शत-शत प्रणाम है |

 

2.      शिक्षा अनुशासन के मार्ग में

न हो कोई बाधा-व्यवधान

अनुशासन प्रिय श्री ललित जी

इसका रखते पूरा ध्यान |

 

3.      जब दुःखों की हो भरमार

मन रोने को हो बारम्बार

हंसने-हंसाने में जिनका अधिकार

दुःख बांटने तुम्हारे आ जायेंगे

साहित्य-संगीत प्रेमी श्री राजकुमार और श्री तुषार |

 

4.      महिमामंडित प्रिय प्रतिभा, मृदुला, मिनी त्रिमूर्ति

सखी, मिनी तुम्हारे अभाव की, कर सकता नही कोई पूर्ति

इस संस्था की मूलाधार तुम्हीं |

इसे निराधार करने का, तुमको कोई अधिकार नही.

आर्शीवचन देती हूं तुमको, सपने हो तुम्हारे सारे साकार

पर अंतर्मन को केसे समझाऊं, विदाई का मचा है हाहाकार |

 

 

5.      प्रिय उज्मा, मंजलेश की वाणी से.

सरलता-सरसता का झरना बहता  अति मनहर,

गिरिजा, दीप्ती, विनीता अगनित गुणों से

अपनी छाप छोड्ती जन मानस पटल पर |

 

 

 

6.      श्री भागीरथ जी का सुव्यवस्थित मंच संचालन

श्री एस.एस. भाटी जी का समुचित पुस्तकालय नियमन

सचमुच है मनभावन इनकी कार्यलगन

इनके ही अथक कलापो से विधालय बनता मंदिर सा पावन |

 

7.      विधालय मे आते ही, दो कर्मवीरो के दर्शन होते है |

कार्यालय में कर्म पुजारी श्री राजेंद्र जी प्रथम

मंच पर उत्साही श्री राजेंद जी द्वितीय उपस्थित होते है |

दोनो कुशल कार्य में अपने, परहित मे रहते तत्पर

कितना भी हो भार सही, पर विश्राम न लेते पल भर

 

8.      प्रिय अंजली, वंदना दोनो का मूल मंत्र हे एक

जप, तप, व्रत सत्कर्मो से लाभ मिलते है अनेक |  

जर्मन भाषा में पारंगत, श्री मोहितजी से सब मोहित

मत मन को करना, तुम क्षणभर भी विचलित |

व्यर्थ चिन्ता ओ से मत होना, तुम जरा भी परेशान

उज्जवल भविष्य प्रतीक्षारत है, बढाने को तुम्हारी शान.

 

9.      प्रिय ललिता, अर्चना और राधा

न आये जीवनमें तुम्हारे कोई बाधा

प्रिय छाया, इसरावती, पायल को सुबुद्धि की देवियां जानो

श्री नटवरजी यथानाम तथा गुण का बोध कराते मानो |

 

10. श्री भ्ररत जोशी जी का मै करती हार्दिक अभिवादन

कहने को तो वैसे हफते मै आप आते केवल दो दिन

पर दो-दो कार्यालयो की सेवा करते, सच्चे मन से हर दिन |

 

शन्नो का हर गीत अधूरा, साथियों तुम्ही से होगा पूरा

के.वी. परिवार के सब साथियो को मेरा प्रणाम

शब्द सुमन की माला से मै करती सबका सम्मान |

 

                                      

                                           द्वारा:-   डॉ.शन्नो तिवारी

                                            टी.जी.टी अंग्रेजी 

                                           (के.वि. रेलवे, गांधीधाम)

 

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केन्द्रीय विद्यालय रेलवे परिवार

हिन्दी पखवारा – 2013 के पर्व पर

 

स्वरचित कविता : कब आएगा वो वक़्त

 

ज़िंदगी के सफर में हमसफर चाहती थी,

बहुत रह लिया अकेले अब किसी का साथ चाहती थी।

मिला मुझे सबकुछ वही जैसा मैंने सोचा था,

हमसफर भी मिल गया मुझे जो सिर्फ मुझे चाहता था।

 

लेकिन क्या मेरी किस्मत ने ली है अंगड़ाई,

साथ पा कर भी ज़िंदगी ने दूरियां बढ़ाई।

एक छोटी सी भूल मुझे कहाँ है ले आई,

कागज़ के टुकड़े की मैंने सबसे बड़ी सज़ा पाई।

 

आज सब कुछ हैं मेरे पास,

फिर भी अकेली हूँ मैं।

यूं तो मेहफिल है चारों तरफ,

फिर भी तनहा हूँ मैं।

 

जानती हूँ मेरी तरहा तुम भी तड़पते हो,

मिलने की आस में हमेशा रहते हो।

सबकुछ पास होते हुए भी कुछ भी साथ नहीं हैं,

जाने किस बात की सज़ा इस तरहा मिल रही है।

 

सोच मे डूबे रहते हैं मेरे दिन मेरी रातें,

इंतज़ार में डूबी रहती हैं आँखें।

कब आएगा वो वक़्त जब साथ रह पाएंगे हम और तुम,

ज़िंदगी की नयी शुरुआत कर पाएंगे हम और तुम।

कब आएगा वो वक़्त? कब आएगा वो वक़्त?

पुछती रहती हूँ मैं अपेक्षा अपने आप से।

द्वारा : अपेक्षा वाघेला

प्राथमिक शिक्षिका

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हिन्दी पखवाड़ा – 2013

स्वरचित कविता : माँ का संदेश

 

माँ ने संदेश लिखा – बोली कैसे हो बेटा तुम

एक-एक कर दिन गिन रही हूँ – आशा है जल्दी आओगे तुम

 

भेजा था तुमको रण क्षेत्र में – वीरता की परीक्षा देने को

मुझे निराश न करना ऐ लाल – तुम्हें रहना है तैयार जाँ देने को

 

इस दूध की कसम है तुमको प्रिय बेटे

माँ का सिर न झुकने देना इस संसार में

 

भले ही दुश्मन लाख चालें चले तुम्हें डराने को

नेस्तनाबूत कर देना उनके सभी ठिकानो को

 

अगर लड़ते-लड़ते तेरी जान इस जन्म में जायेगी

तेरी माँ भगवान से लड़कर तुझे फिर से अपना बेटा बनाएगी

 

अपनी जान की फिकर बिलकुल न करना रणभूमि में

अरे तू तो मेरा लाल है आने वाले सातौ जन्मो में

 

 

द्वारा: पंकज सिंह

परास्नातक शिक्षक (संगणक विज्ञान)

के.वि. रेलवे , गांधीधाम, गुजरात

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कविता : एक दिन चले जाना है

 

एक हमारी धरती माता,

एक गगन है प्यारा।

एक जल के हम पंछी है,

एक पवन है न्यारा।

 

एक सूर्य की किरणों से हम

नियमित नहाते है

एक चंद्रमा के आने से

सपनों में खो जाते है।

 

एक प्राण है तन मे सबके

एक दिवस ही जाना है।

इस मिट्टी में एक दिन

हम सबको मिल जाना है।

 

द्वारा: राजेन्द्र बड्गोती

सब स्टाफ

के० वि० रेल्वे गांधीधाम (कच्छ)

 

 

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हिन्दी पखवारा – 2012 के पर्व पर

 

आओ आओ सब मिल देखे – ‘प्रमिला’ के के.वि. परिवार को

प्रतिभाइसमे बहुत बहुत है भरीदेखो चाहे ‘मिनी’ हो या ‘दीप्ति

आओ करे अँग्रेजी शुरूजब साथ हो हमारी ‘नीरू

गणित मे न लगे कोई डरजब साथ हो ‘सुवर्णा’ निडर

जब भी कोई काम हो विशेषतो याद आये हमारे ‘दिनेश

ललित’ कलाओ मे सब पर भारीज्ञान की ‘छाया’‘शन्नो तिवारी

कलासंगीत की रिमझिम फुहारलाये है ‘सोनम’ और ‘तुषार

अनुशासन की ‘चन्दन’‘सरिता’ का यश बदता रहेऐसी तुमसे ‘अपेक्षा’ है ‘अनुज’‘श्रेयस

म्रदुभाषी ‘मृदुला’ की वाणी की ‘सरिता’ बहती रहेऐसी ‘वंदना’ करे ‘विनिता

माना ‘पुरुषोत्तम’,‘कंचन भाई’ की है घनी यारीपर ‘राजकुमार’,‘राजेंद्र’ है सब पर भारी

संस्कृत है जननी सभी भाषाओ कीलगाई ‘दर्शना’ ने हुंकार,

जर्मन है आने वाले समय की मांगऐसा कहे ‘शंभू कुमार

आया होगा आप सभी को ‘आनंद’ इस तुकबंदी मे,

बहुत जान है ‘पंकज’ की इस जुगलबंदी मे।

 

 

द्वारा:

पंकज सिंह

परास्नातक शिक्षक (संगड़क विज्ञान)

के.वि.रे.गांधीधाम